Monday, 5 October 2015

हमारी सच्ची खुशियाँ

अनंत प्रकाश, उज्ज्वल और तीव्र, दृश्यमान करता है-संसार को|
जो रात के अंधेरों में कहीं खो सा जाता है|
पर-
जीवन को देखने और समझने के लिए अंतर्मन की एक किरण ही पर्याप्त है|
 
समय बांधता नहीं, समय साधता है- प्रयासों को|
समय पर, समयानुसार किए जाने वाले कर्म जीवन का मूल आधार हैं
और मार्ग है उस शिखर पर पहुँचने का, जिस शिखर पर हर कोई पहुँचना चाहता है|
 
सहज कुछ भी नहीं होता, हमें खोजना होता है- वह पथ|
जो मिलाता है- हमें- हमसे
जो हमें हमारे सपनों की ओर अग्रसर करता है|
वे स्वप्न जिन पर हम विश्वास करते हैं
और जिन्हें हम अनुभव करते हैं
जिसे हम जीते हैं- हर सांस में, हर पल, हर क्षण
 
पर आवश्यकता है उस किरण को देखने की और महसूस करने की
जो अंतर्मन से उठकर चलती हैं
और हमें खुशियों का आभास करती है
 
हमारी सच्ची खुशियाँ
जिसे हमने कभी चाहा है और आख़िरी दिन तक चाहते रहेंगे|



by
Hem Chandra Tiwari
'MHICHA'

Saturday, 3 October 2015

'युवा-प्रेम'


'युवा-प्रेम'
प्रिय मित्रों! क्या आपने किसी से सच्चा प्रेम किया है? या क्या आप किसी से सच्चा प्रेम करते हैं? एक अन्य प्रश्न जो मैं आपसे करना चाहता हूँ वो ये है कि क्या वर्तमान में 'युवा-प्रेम' सच्चा प्रेम है? इन सभी प्रश्नों के जवाब आप सभी के पास होंगे और आप इन सभी चीजों से परिचित भी हैं| 'युवा-प्रेम' की जो छवि प्राचीनकाल में थी, वो आज कहीं न कहीं धुंधली होती जा रही है| अपने आप को छोड़कर अगर आप अन्य के प्रेम जीवन के बारे में बात करें तो वह कहीं न कहीं उस पराकाष्ठा को नहीं छू पाता जो 'प्रेम' शब्द में झलकती है| "अपने आप को छोड़कर.." से मेरे तात्पर्य यूँ था क्यूँकि बहुत ही कम ऐसे महानुभाव होंगे जो स्वयं में खोट निकालना पसंद करते हों; अपितु इसके दूसरो में खोट निकालना ज्यादा सहज महसूस होता होगा| वैसे आप मानव स्वभाव से भली-भाँती परिचित हैं, शायद मुझसे भी कई ज्यादा| अतः आप सहज ही मेरे कहने का तात्पर्य समझ पा रहे होंगे| अब पुनः ऊपर आपसे किये गए प्रश्नों के उत्तर देने को कहा जाये तो शायद आपके उत्तरों से आप पूर्णतः संतुष्ट न हो पाएँ| ऐसा इसलिए नहीं है कि आज के वर्तमान युग में सच्चा प्रेम विद्यमान नहीं है या सच्चा प्रेम करने वाले युवक और युवतियां नहीं है अपितु इसका कारण फिर से मानव स्वभाव ही है|

युवा प्रेम के बारे में बहुत सी बातें हैं जो हम साँझा करेंगे पर इससे पहले युवा प्रेम को चित्रित करना अति आवश्यक है|

आदिकाल या प्राचीनकाल में प्रेम एक दैवीय अनुभूति थी जिसका चित्रण हमारे धर्म ग्रंथो या ऐतिहासिक रचनाओ में पूर्ण रूप से मिलता है| इस समय पुरा प्रेम के विषय में बात करने का एक ही उद्देश्य है कि हमारे मष्तिष्क में पुरा प्रेम की एक छवि उभरकर सामने आये| किसी साहित्यिक प्रेमी की अगर बात करें और प्राचीन प्रेम प्रसंग के परिदृशय को चित्रित करना चाहें तो एक प्राकृतिक वातावरण- लहलहाते खेत, घास के मैदान, बर्फीली चोटियाँ, शोर करता सागर, शांत मधुर कल-कल करता नदियों का पानी एवं लहरें, पक्षियों का सुगान, फूलों के बगीचे, चाँदनी रात और इन सभी के बीच एक युवती का अपने साथी से लज्जावान होना; अन्य कई ऐसी बाते जो प्रेम की एक सुन्दर कल्पना को संजोकर हमारे अंतर्मन को भाव-विभोर कर देती हैं एवं एक प्रेममयी भाव निखरकर हमारे हृदय में उद्दीप्त हो उठता है|

अब बात करते है वर्तमान 'युवा-प्रेम' की तो सीधी सी बात है: हर कोई व्यक्ति अपने कल्पना के सच्चे प्रेम को पाने के लिए प्रयत्नरत है और इसी प्रेम को पाने की होड़ में आज का 'युवा-प्रेम' मात्र उन ज्वारीय लहरों के समान हो गया है जो अत्यधिक शोर करते हुए एक विशाल ऊर्जा के साथ समुद्र की सतह से उठकर मानो अपने प्रियतम को पाने के लिए अत्यधिक उत्सुक एवं प्रयत्नशील होती है और कुछ समय बाद किनारे की एक ठोकर मात्र से ही अपनी संपूर्ण ऊर्जा एवं उत्साह खोकर वापस खाली हाथ लौट जाती है और अदृश्य हो जाती है, इस समंदर में मानो कभी वो थी ही नहीं| फिर कोई अन्य लहर फिर से वही प्रयत्न करती है, ये लहरें; और पुनः ठोकर खाकर अदृश्य हो जाना मानो जैसे युवा प्रेम का स्वभाव बन गया है|


कुछों का प्रेम उस नदी के तरह अस्थिर है जो किसी क्षेत्र को कुछ समय तक मिलने के बाद अचानक अपना मार्ग परिवर्तित कर लेती है और पुनः मुड़कर नहीं देखती| वर्तमान 'युवा-प्रेम' में झील के समान ठहराव वाला प्रेम बहुत ही कम देखने को मिलता है जो युग-युगांतर के लिए एक-दूसरे के लिए ही बने होते है और कभी एक-दूसरे से अलग नहीं होते| वर्तमान में हर दिन न जाने कितने प्रेमी अपने प्यार का इजहार करते हैं और कितने ही अपने प्रेम-सम्बन्धो को तोड़कर नए सम्बन्ध बनाने को अग्रसर होते हैं| यही तो हमारी फितरत है कि जब तक सब कुछ हमारे मनमुताबिक चलता है तो सब ठीक लगता है और जैसे ही कोई चीज हमारे खिलाफ होती है तो जो कल तक हमारा था आज हम उससे मुह मोड़ लेते हैं, ठीक उन्ही लेहरो कि तरह|

और ठीक ही तो है, जो हमारे मुताबिक नहीं जी सकता वो हमसे प्यार नहीं करता, उसे हमारे लिए बदलना चाहिए| सिर्फ प्यार के ढाई अक्षर कह देने मात्र से ही प्यार नहीं होता| अपने प्रेमी के लिए आपका दायित्व मायने रखता है और अपने दायित्वों का निर्वहन ही इस बात का प्रमाण है कि आप उससे प्यार करते है या नहीं| अपने प्रेमी से अपेक्षाएं रखना अच्छी बात है और उसका उन अपेक्षाओं को पूरा करना भी जरुरी है पर उसके लिए आपका फर्ज भी है और वो एक फर्ज ये है कि वो इन दायित्वों के लिए अकेला उत्तरदायी नहीं है आप भी हैं जिसे इन दायित्वों को पूरा करना है| सच्चे प्यार में कोई व्यक्ति किसी भी बात के लिए अकेला उत्तरदायी नहीं होता| यह एक प्रेमी जोड़ा है जो हर परिस्थितियों में साथ रहता है, एक दूसरे को समझता है और अपने प्रेम से परिस्तिथियों को अपने अनुकूल बनाता है|

आह! कितनी छोटी सी बात है ये और इसे समझने में न जाने क्यों हमें इतनी परेशानी होती है| जिंदगी गुजर जाती है रिश्ते बनते हैं और बिगड़ते हैं और जाने-अनजाने में अपने सच्चे प्यार को हम खो बैठते हैं| अगर ये छोटी सी बात अमल में लाएँ तो युवा प्रेमी कई मायनो में अपने सच्चे प्रेम को चरितार्थ कर पाएंगे| अब मैं अपनी पहले कही हुई बात दोहराता हूँ कि वर्तमान युग में भी सच्चे प्रेमी और सच्चा प्रेम विद्यमान है, पर जरुरत है तो मानव स्वभाव को समझने की, अपने प्रेमी को जानने की, उसके लिए वफ़ादार रहने की और उसकी खुशियों का ख्याल रखने की| सच्चे प्रेम का मतलब है दो आत्माओं का मिलन और जब दो आत्माएं एक हो जाती हैं तो उनका अलग होने का सवाल ही पैदा नहीं होता| वास्तव में 'दो जिश्म एक जान' वाली बात सच्चे प्रेम की आधारशिला है|

ये तो बात थी सच्चे प्रेम की पर मन बहुत ही कुंठित होता है जब समाज को भ्रष्ट प्रेम के जीवो द्वारा जकड़े हुए देखता हूँ| असल में इसका एक कारण आकर्षण और प्रेम में विभेद नहीं कर पाना है| चलो ये बात भी थोड़ी पचा ली जाये तो वो लोग जो सिर्फ प्यार के नाम पर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं उन्हें प्यार शब्द का मतलब भी नहीं पता और प्यार शब्द के आड़ में वो सिर्फ अपनी कामुकता को सार्थक करते हैं, उन्हें प्यार शब्द को बदनाम करने का कोई हक़ नहीं है| अगर कामुकता की बात आ ही गयी है तो एक तीसरा पहलू भी मैं अवश्यरूप से यहाँ पर उद्धृत करना चाहूँगा| हालाँकि वर्तमान युवा पीढ़ी पाश्चात्य संस्कृति से काफी प्रभावित है और उसी के प्रभाव में वे अपने मार्ग से भटक रहे हैं पर ये भटकाव छणिक है| जिस तरह से बीच समंदर में जहाज पर डेरा डाले हुए एक पक्षी पूरे आकाश का चक्कर लगाने के बाद फिर से उसी जहाज पर आकर ठहरता है, उसी तरह भूले-भटके युवा एक दिन स्वाभाविक रूप से सद्मार्ग पर अग्रसित होंगे| पर उन लोगो का सद्मार्ग पर लौटना नामुमकिन है जो कामुकतावश यह भी भूल गए है कि वो तो इंसान हैं, कोई शैतान नहीं| शायद आप समझ गए होंगे कि मैं किन लोगो की बात कर रहा हूँ| ये वही लोग हैं जिन्होंने कामुकतावश मानवता को शर्मशार किया है और यही वो लोग भी हैं जो 'युवा-प्रेम' के दुश्मन हैं| क्या हो गया इन लोगो को जो ये इतने विवश हो जाते हैं कि किसी नारी की इज्जत करना ही भूल जाते हैं| धिक्कार है इन लोगो को जो ये राक्षसों से भी नीच हरकत करने पर उतर आते हैं| रामायण में रावण ने सीता माँ का हरण अवश्य किया था पर नारी की मर्यादा का ख्याल तो उसने भी रखा था|

'युवा-प्रेम' के द्वारा मैं सिर्फ इस विषय पर अपने विचारों को आपके साथ साझा करने की कोशिश कर रहा हूँ| शायद कुछो को मेरी बातें अच्छी लगी और कुछो को नहीं भी पर इतना जरूर है कि कहीं न कहीं आप ये जरूर सोच रहे हैं कि क्या मेरा प्रेम सच्चा प्रेम है?



by
Hem Chandra Tiwari
'MHICHA'

Saturday, 26 September 2015

लेना देना तो उसूल है जिंदगी का

लेना देना तो उसूल है जिंदगी का

लेना देना तो उसूल है जिंदगी का
मेरा इज़ेहार था तो उसका इनकार था
यूँ कहूँ कि एक तरफ़ा प्यार था

एक अजनबी जब अपना हो जाए
वही हक़ीकत वही सपना हो जाए
तो दौर शुरू होता है दिल्लगी का
लेना देना तो उसूल है जिंदगी का

मैने प्यार दिया अपना
उसने नफ़रत की सौगात दी
मैने नींद उसे सौंप दी
उसने ख्वाबो की बरसात की
असलियत में जो दिया
उसने सिर्फ़ आलम बेबसी का
लेना देना तो उसूल है जिंदगी का

मैने दिल जो उसको दिया
उसने जख़्मो से भर दिया
मेरी सांसो में उसका नाम था
उसने यादों से रुखसत किया
खुशी के पल दिए मैने उसे
उसने उपहार दिया फरेबी का
लेना देना तो उसूल है जिंदगी का

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             by
Hem Chandra Tiwari
'MHICHA'

Saturday, 29 August 2015

आरक्षण की आत्मकथा, एक कल्पना, एक सोच



 आरक्षण की आत्मकथा, एक कल्पना, एक सोच
मैं आरक्षण हूँ|भारत देश में मेरा जन्म हुआ, यहीं पला-बड़ा और यहीं मेरा अंत भी सुनिश्चित है| जैसे हर कोई इस संसार में जन्म लेता है, किसी एक खास मकसद के लिए, शायद मेरा भी कोई मकसद रहा होगा| जिसने मुझे इस समाज में जन्म दिया, वह इंसान काफी नेक दिल था पर ये समाज हर तरह के प्राणियों से भरा पड़ा है; इनके बीच अपने कार्यसिद्धि को प्राप्त कर पाना बहुत कठिन है | मुझे जहाँ तक याद है- मेरा जन्म हुआ उन लोगो को समाज के अन्य वर्गो की तरह अग्रसर करने के लिए जो जातिवाद नामक राक्षस के आतंक में कहीं पीछे छूट गए, जो अपने जीवन यापन को बोझ समझने लगे, जातिवाद ने जिनके आत्मविश्वास को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया; मैं बनाया गया उन लोगो की स्तिथि सुधरने के लिए जो कुछ अहंकारी और अंधविस्वाशी लोगो के पाखंडों के चलते अपने जीवन को शापित सहमझने लगे|

मैंने पूरी तरह से कोशिश की कि में अपने जीवन को सार्थक कर पाऊँ, उन लोगो की पूरी तरह से मदद करके और काफी हद तक मैंने किया भी| जो मेरे संरक्षक थे, वो अब नहीं रहे; पर आज कुछ लोभी लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए मेरा संरक्षक बने घूमते हैं और वो इंसान भी तो अब वैसे नहीं रहे जिनके लिए मुझे बनाया गया था| मेरे बनाना वाले का दिल बहुत बड़ा था| उसने चाहा था कि सभी को समान रूप से हक़ मिले और जिन्हे नहीं मिल पाता, मैं उन्हें उनका हक़ दिलाने में मदद करू| इस कार्य के लिए मुझे शासन और प्रशाशन दोनों से ही अधिकार प्राप्त हुए और उन अधिकारों का मैंने अच्छी तरह से उपयोग किया|

पर आज जब समाज में मैंने लोगो को मेरे लिए झगड़ते देखा तो बहुत ही ग्लानि हुई| आज जो लोग मेरे द्वारा सक्षम बनाये गए, वो भी उन्ही लोगो में शामिल हो गए हैं जो दूसरे पिछड़े लोगो को आगे नहीं बढ़ने दे रहे| तुम सोच रहे होंगे कि मुझे आज अपनी आत्मकथा लिखने की जरुरत क्यों महसूस हुई| वो इसलिए क्यूंकि समय बदल रहा है और समय के साथ-साथ समाज भी| प्राचीन समय में जो लोग समृद्ध थे, वो आज नहीं रहे और कुछ लोग जो समाज के सताए हुए थे उनमे से काफी लोगो को में समृद्ध बना चुका हूँ अपना कर्म करते-करते मेरी उम्र हो गयी है |अब मैं बूढ़ा हो चला हूँ| मेरे कंधो में अब वो जान न रही कि पूरे समाज का बोझ अपने सर पे रखकर चलूँ| मेरे बच्चों मुझे अब आराम की जरुरत है| तुम्हारी जरूरतें पूरी करते-करते न जाने मैंने कितनो का हक़ छीना है, न जाने कितनो की आशाओ पे पानी फेरा है और न जाने अनजाने में कितने स्वार्थी और लोभी लोगों का घर भरा है| इन सबके लिए शायद परमेश्वर मुझे कभी माफ़ नहीं करे और मुझे इस चीज का अफ़सोस भी नहीं है क्यूंकि मैंने जो कुछ भी किया अपने रोते-बिलखते बच्चों के लिए किया| आज समय आ गया है जब इस बूढ़े को चैन से मरने दिया जाए| मैं अब और कुछ नहीं कर सकता| मेरा शरीर जीर्ण होता जा रहा है और शरीर पे कुछ कोड भी निकल आया है| ये मेरे पापो का फल है शायद या उन तमाम लोगो की बद्दुआ जिनके हाथ से निवाला छीनकर मैंने तुम्हे दिया| अब वक़्त आ गया है कि तुम अब अपने पैरों पे खड़े हो जाओ और अपना और दुसरो का हित जानकर कर्म करो और इस संसार में आने का अपना उद्देश्य सिद्ध करो|

मैं तुम्हे अपनी जवानी के दिनों की एक बात बताना चाहता हूँ, जिसे मैंने तुमसे आजतक छिपाए रखा| मुझे मेरे जीवन में एक लड़की से प्यार हुआ तब में छोटा था और वो कौमार्यावस्था को पार कर चुकी थी | शायद तुम्हे हैरानी हो रही होगी और तुम्हे ये बात समझ भी न आये, पर सच तो ये है कि प्यार किसी से भी हो सकता है| आज तक तुमने हीर-राँझा, लैला-मजनू की कहानी पड़ी होगी; आज एक कहानी मेरी भी सुन लो| मैं अपने आखरी वक़्त में तुमसे कुछ छुपाना नहीं चाहता|


वो एक सौंदर्य से भरी हुई, कामुक कर देने वाली, परी के समान एक चंचल कन्या थी, जिसका नाम वर्ण व्यवस्था था| मैंने उसे पहली बार देखा तो पहली नज़र में ही प्यार हो गया| तब मुझे सिखाया जा रहा था कि मुझे समाज में किन लोगो से तुम्हे बचाना है और तुम्हारा हक़ दिलाना है| उस समय मेरी मानो दिल की धड़कन ही रुक गयी जब मुझे उसी लड़की को दिखा कर कहा गया कि वो मेरी दुश्मन है, “ इससे अपने हक़ की लड़ाई लड़नी है तुम्हे”| पर उसका नाम कुछ अलग लिया गया- ‘जातिवाद’| उसका वह रूप काफी डरावना था| उस सुन्दर काया के पीछे की काली परछाई मैं साफ़ देख पा रहा था| उसने जैसे पूरे देश को अपनी जागीर समझ लिया हो और हद तो तब हो गयी जब तुम लोगो को तुम्हारे हको से वंचित रखा जाने लगा| तब मैंने ठान लिया कि इस प्रेम रोग को यहीं समाप्त कर देना उचित रहेगा और मैंने उसे अपने दिल की अँधेरी कोठरी में कही दफ़न कर दिया और तभी से मैं तुम लोगो का भरण-पोषण करता आ रहा हूँ, अपनी संतान की तरह|

आज शाम को जब मैं अपने आप मैं ही खोया हुआ सा शहर की सड़कों से होता हुआ एक गाँव की तरफ गया और उसके होने की कहीं भी खबर नहीं मिली| तो मैंने लोगो से पूछा| ये वही लोग थे जिनका उसने-लालन पालन किया और आज इन्ही ने उसे घर से निकल दिया| शायद ये समझ गए हैं कि उसके जीवन निर्वाह के रास्ते गलत थे और जब इस आधुनिक युग में लोगो पे रोजगार नहीं होता , दो वक़्त की रोटी नहीं होती और रहने का ठिकाना नहीं होता तो फिर काहे का बड़प्पन| मैं आज देख पा रहा हूँ; कुछ लोग तुम में से और कुछ इनमें से, जो एक साथ मिलकर एक दूसरे की मदद कर रहे हैं और उचित मूल्यों पर जीवन निर्वाह कर रहे हैं| ये वह ओग हैं जिन्होंने काफी समय पहले ही उसका दामन छोड़ दिया पर कुछ अब भी लोभवश उसी के बताये राश्ते पर चल रहे हैं| हालांकि अब वो इनके साथ भी नहीं रहती| पर कहा गयी वो?

मैं उसे ढूंढने निकल गया और रात हो गयी| तब एक सुनसान जगह पर, इस शोर शराबे से दूर मुझे उसकी छवि दिखाई दी| वो कुछ बदली-बदली सी लग रही थी और बूढी भी हो गयी थी| उम्र में मुझसे ज्यादा पर शायद दिखने में मेरे जितनी| उम्र और काया के बीच अछा तालमेल बना के रखा होगा इसने; तभी मुह में झुर्रियां आने के बाद भी इसके चेहरे की कांति पहले से कई गुना बाद गयी है| मैं धीरे से उसके पास गया| तभी एक झोपड़ी के अंदर से किसी की आवाज़ आई और उसने उसे भीतर बुला लिया| मैं वहाँ नहीं जाना चाहता था, पर मैं खुद को रोक नहीं पाया और मेरे कदम झोपड़ी की ओर ब ने लगे| मैंने दरवाजे पर दस्तक दी तो एक युवक बाहर आया और उसने मुझसे वहाँ आने का कारण पूछा; पर मैं कुछ बोल नहीं पाया| इतने में उसने मुझसे अंदर आने को कहा और मैं उसके पीछे-पीछे चल दिया| अंदर झोपड़ी में भी वो कहीं दिखाई नहीं दी; पर तीन अन्य युवक दिखाई दिए|

उन चारो ने मिलकर मुझे आदर दिया और खातिरदारी की| उनके संस्कारो से ही प्रतीत होता था कि उनमे काफी प्रेम भाव है| मैंने उनसे उनका नाम जानना चाहा तो सभी एक साथ बोले “मैं भारतीय हूँ”| मैं अचंभित था कि इन चारो का एक सा नाम कैसे हो सकता है| फिर भी मैंने उनसे दोबारा अपना अलग-अलग नाम बताने को कहा; पर फिर भी हर एक ने वही उत्तर दिया, जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी| मेरे चेहरे के हाव-भाव ही बदल गए| तभी उनमे से सबसे बड़े ने मुझसे आकर कहा, “ मान्यवर! कभी इस पाखंडी समाज ने हमें अपने स्वार्थ के लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और सूद्र नाम दिया था और हमारे बीच मतभेद पैदा कर दिए थे; पर आज हम एक हैं और हमें उस ज्ञान की प्राप्ति हो गयी है कि इंसान जन्म से नहीं, बल्कि कर्म से महान होता है”| उसने मुझसे कहा कि उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि समाज के अनैतिक तत्व उनके बारे में क्या कहते है और क्या सोचते हैं; पर वो इतना जानते हैं कि अगर वो चारो भाई आपस में मिलकर रहे तो उनका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता| उनकी बातें सुनकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई और मैं जहाँ अपने द्वारा किये गए कर्मो को खोज रहा था उसका फल मुझे इस गरीब की कुटिया में आकर मिला| यहाँ सभी अमीर थे; पर मैं नहीं कह सकता कि कौन ज्यादा अमीर था| सभी तो एक जैसे ही थे; आपस में मेलजोल से रहते हुए|

वैसे उन्होंने मुझे बताया कि उन्हें ये ज्ञान उनकी माँ ने दिया और उसने मुझसे मिलाने के लिए अपनी माँ को अंदर रसोई में आवाज़ दी “ माँ”| मैंने जब उनसे उनकी माँ का नाम पूछा तो उन्होंने बताया की उसका नाम वर्ण व्यवस्था था| तभी मुझे उस देवी के दर्शन हुए; पर ये तो वही जातिवाद थी जिससे मैं आज तक लड़ता आया था| ये वो तो नहीं हो सकती थी|

रात के खाने के पश्चात हम दोनों में बातें हुई|हम दोनों एक दूसरे को नम आँखों से निहार रहे थे| उसने मुझे बताया कि माँ-बाप के देहांत के बाद उसका पालन-पोषण उसके चाचा ने किया| माँ बाप ने जो उसे शिक्षा दी थी और जो उसका कर्तव्य था, वो शिक्ष अभी अधूरी ही थी| तभी से उसके चाचा उसको बड़ा करते आये थे और उन्होंने ही अन्य लोगो के लिए उसके दिल में जहर भरा| बुढ़ापे में घर से निकाले जाने के बाद वो अपने माँ-बाप के घर वापस आई जहाँ पुराने खंडहरों के अलावा कुछ नहीं था; थी तो कुछ यादें और एक पूराना खत जिसमें लिखा था-




प्रिय पुत्री!

वर्ण व्यवस्था,

हम तुम्हे बताना चाहते हैं की हमारे पास ज्यादा समय नहीं है . पता नहीं तुम ये पत्र कभी पड़ोगी भी या नहीं| पर जब तक तुम इसे पढ़ोगी तो तुम्हे सच्चाई का पता चल चुका होगा| तुम्हारा चाचा, जो हमारे बाद तुम्हारा संरक्षक बनेगा, बाकी लोगो को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ता और इसीलिए उसे हम पसंद नहीं थे, क्युकी हमने कभी ऐसा नहीं चाहा| तुम अभी छोटी हो और तुम्हारी शिक्षा अधूरी है ; पर मैं जानता हूँ कि समय के साथ-साथ तुम अपने कर्तव्यों को समझने लगोगी, अगर उस पाखंडी चाचा से बच सकी तो| फिर भी जाते- जाते में तुम्हे संक्षेप में कुछ ज्ञान देना चाहता हूँ -

· सभी लोग कर्मो के आधार पर श्रेष्ठता को प्राप्त करते हैं जन्म के आधार पर नहीं|
· इंसान के धर्म करम से पहले उसे ये सोच लेना चाहिए कि वो मानवता के हित में है या नहीं|
· आपस में प्यार और सौहार्द ही तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत है|
· इहलोक के सद्कर्म परलोक में मनुष्य की आत्मा को मोक्ष प्रदान करते है|
· रंग- रूप इत्यादि , ये सब भौगौलिक आधार पर ही विविध हैं| जो भी इस आधार पर समाज में विष घोलता है वह इस समाज में एक राक्षस की तरह है और पुत्री! तुम्हे अपनी प्रतिभा और सोचने समझने की शक्ति से उस राक्षस का वध करना है|

 अब बाकी सब तुम पर है|

अलविदा!




------------------------------------------------ ---------------------------------आज मैं और वर्ण व्यवस्था साथ साथ है , हम अब एक हैं , एक दूजे के प्यार में बंधे हुए और वो चार लड़के उन्होंने मुझे अपने साथ रखने से इंकार कर दिया क्यूंकि वो सत्य को जानते हैं और कर्म पर विश्वास करते हैं | उन्हें सहानुभूति में मिला सुख अस्वीकार है | मैं कह सकता हूँ कि आज का युवा समाज स्वावलम्बी है | ऐसे में मेरा कर्त्तव्य ये है कि मैं तुम्हे भी सच से अवगत कराऊँ| जिस तरह वर्णव्यवस्था के माँ- बाप एक पत्र के सहारे उसे जीवन का सत्य समझा गए वैसे ही मैं ये ज्ञान तुम्हारे साथ साँझा कर रहा हूँ| हम दोनों ही अब बूढ़े हैं और एक साथ ही इस संसार को छोड़कर जल्द ही चले जायेंगे| बस तुम सबको आपस में मिलजुलकर रहते हुए देखना चाहते हैं और अब ये तुम्हारा कर्तव्य है कि जो तुम्हारे भाई लोग पीछे छूट गए हैं उनको खुद की मदद से और अपने अन्य नए भाइयों की मदद से जीवन पथ पर अग्रसर करो| वर्णव्यवस्था भी यही चाहती है और उसके वो चार जवान लड़के तुमसे जल्द आकर मिलेंगे| फिर तुम अन्य लोगो को भी ये ज्ञान बांटना| मैं जितना तुम्हे दे सकता था उतना मैंने दिया| अब ये कार्य मैं और नहीं कर सकता , सच को जान लेने के बाद तो कदापि नही|

और हाँ जाते जाते एक बहुमूल्य नसीहत तुम्हे देना चाहता हूँ कि आज भी वर्णव्यवस्था का चाचा समाज में कही डेरा डाले हुए है| हो सके तो उसे जड़ से समाप्त कर दो या उससे बचकर रहो|. इसी में तुम सबकी भलाई है और इस कार्य में वो चार युवक तुम्हारी मदद के लिए निकल चुके हैं| उनका आतिथ्य अपने परिवार का सदस्य मानकर ही करना और एक परिवार में हमेशा बंध कर रहना| वर्णव्यवस्था के माँ बाप के द्वारा लिखे पत्र में बताई गयी सीखो को क्रियान्वित करना| यही तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा------------------------------------------------------------------------------------------------

तुम्हारा
बूढ़ा पिता /संरक्षक!

आरक्षण    




With the spoken pen of awareness

HEM CHANDRA TIWARI ‘Mhicha’



 


Friday, 28 August 2015

रक्त से लिपटी है धरती

रक्त से लिपटी है धरती


रक्तसिंचित भूधरा है कांपता हर अंग है
रक्त से लिपटी है धरती लाल इसका रंग है
कुछ समय पहले यहाँ तो उड़ रही थी तितलियाँ
पर न जाने आज क्यों रो रहा ये कंठ है ...

बर्फ की छाती फटी है बह रही है धार जो
तीव्र नाद कर रही है वेग इसका मंद है
रिंस रहा है रक्त जो जननी माँ के गर्भ में
देख कर ये नरसंहार माँ की ममता दंग है ...

चील यूँ मंडरा रहे है लाशो के इन ढेर पे
चंचल मन शिथिल पड़ा है कैसा ये अचम्भ है
शुष्क ठंडी वादियों में कटती हुई पतंग है
रक्त से लिपटी धरा है लाल इसका रंग है ....




by
Hem Chandra Tiwari
'MHICHA'


Wednesday, 26 August 2015

एक सार्वजनिक पत्र गुजरात आंदोलन के नायक हार्दिक पटेल के नाम

एक सार्वजनिक पत्र गुजरात आंदोलन के नायक हार्दिक पटेल के नाम
 
 
प्रिय  मित्र!                                                                                                              दिनांक :  25/08/2015
हार्दिक  पटेल  जी                                                                                                  बुधवार, समय : 02:39  

आज जब टेलीविजन पर न्यूज़ चैनल के माध्यम से आपके द्वारा चलाये गए 'आरक्षण आंदोलन' का विकराल रूप देखा तो आपके बारे में जानने की उत्सुकता हुई और 'नवभारत टाइम्स' की फेसबुक पर की गयी एक पोस्ट के द्वारा मैं आपके बारे में कुछ बातें जान पाया| निसंदेह आपमें नेतृत्व करने की असीम प्रतिभा है और शायद आप इन सियासी जंजालों से झुंझले हुए हैं, नहीं तो मात्र बाईस वर्ष की उम्र में इतने विशाल जनसमूह का नेतृत्व करना किसी सामान्य युवक के वश की बात नहीं|

जितना मैं समझ पाया उस हिसाब से पूरी आफत की जड़ 'भारत में निरंकुश आरक्षण' है, एवं इसमें कोई संदेह नहीं कि आरक्षण के काले बादल प्रतिभा के सूर्य की कांति को उद्दीप्त नहीं होने दे रही| ऐसे में हमारा कर्तव्य है कि इन बादलों को हटायें कि इन्हें बढ़ावा दिया जाए; वरना वह दिन दूर नहीं जब पूरा देश इस आरक्षण की आग में झुलस रहा होगा और प्रतिभा देश के किसी कोने में सिर छिपाने की जगह ढूंढ रही होगी|

इतिहास के पन्नों में गुर्जर और मराठा के बाद एक और नाम जुड़ गया 'पटेल' का, जिन्होंने आरक्षण की मांग की| शायद वाकई वर्तमान भारत में अब प्रतिभा का कोई मोल नहीं रहा| आज शायद मैं भी वही बन जाऊं जिसके (आरक्षण के ) मैं खिलाफ हूँ और आरक्षण की छत्रछाया में अपना जीवन सफल भी कर लूँ; पर आने वाली प्रतिभाशाली युवापीढ़ी को क्या जवाब दूँगा? वो फिर तरसेंगे और तड़पेंगे अपने हक़ को पाने के लिए और हर बार एक नया हार्दिक पटेल खड़ा होकर उनका नेतृत्व कर रहा होगा और फिर से सड़को पर देह्सत का नंगा नाच होगा| अगर ऐसे ही चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब देश का हर समुदाय आरक्षित होगा और हर क्षेत्र में अप्रत्यक्ष रूप से भारत का बंटवारा होगा जैसे एक परिवार में भाइयों के बीच जमीं जायजाद को लेकर होता है|

मुझे अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि मैं इस आंदोलन में आपके साथ नहीं हूँ, इसलिए नहीं कि मैं एक पटेल नहीं हूँ बल्कि इसलिए कि मैं आरक्षण का एक सताया हुआ सामान्य जाती का युवक हूँ, जो शायद आपसे सहमत होता अगर ये आंदोलन आरक्षण मांगने कि बजाय आरक्षण हटाने के लिए किया जाता|

मैं उम्र में आपसे दो वर्ष बड़ा हूँ और शायद तजुर्बे में आपसे छोटा पर एक आम इंसान कि हैसियत से आपसे ये गुजारिश करता हूँ कि इस आंदोलन का रुख मोड़कर आरक्षण हटाने के लिए किया जाये| अगर मेरे इस सार्वजनिक पत्र ने आपकी शान में कोई गुस्ताखी कि हो तो बड़ा भाई होने के नाते आपसे क्षमा की आशा रखता हूँ|

आपका प्रिय मित्र!
एक सामान्य युवक

कई भाई लोग साथ आ रहे हैं, अच्छा लग रहा है, एक नया भारत दिख रहा है। आजाद हिंद के सपनो का अब फिर परचम लहरा है। उन्नति के शिखरों में अब राज्य ह...