Tuesday, 5 December 2017

अधूरा इश्क़



फ़लसफ़ा मेरी यारी का कुछ ऐसा रहा
कुछ मेरे कुछ उसके अरमानो का जनाज़ा निकला
और फिर भी शहनाइयां बज रही थी अपनों के घर
मिलती आवाज़ें थीं और मिलते दस्तूर भी
पर ज़िन्दगी के मायने कुछ बदले हुए से थे।

अधूरे इश्क़ की दास्ताँ कुछ ऐसी थी
न वो रूठे हमसे न हम ही उनसे रूठे थे
हर वफ़ा सच्ची थी हर वादे झूठे थे
बस ये समझ लीजिए ज़नाब
वो आज भी अधूरे हैं जो कल तक अधूरे थे।
#mhicha

Saturday, 2 December 2017

न जाने किस तलाश से गुज़र रहा है दिल कुछ दर्द भी है कुछ अक्स भी तन्हाइयों में कहते हैं मुद्दत से मिलता है प्यार कई मन्नतो से ऐ खुदा मुझे मेरी अर्ज़ियों का हिसाब देदे।


न जाने किस तलाश से गुज़र रहा है दिल
कुछ दर्द भी है कुछ अक्स भी तन्हाइयों में
कहते हैं मुद्दत से मिलता है प्यार कई मन्नतो से
ऐ खुदा मुझे मेरी अर्ज़ियों का हिसाब देदे।
#mhicha

पहाड़ी गीत.... गायक: त्रिभुवन महरा

मेरे मित्र त्रिभुवन महरा जी के इस गीत को सुनें एवं बताएं कि आपको कैसा लगा। पिथौरागढ़ के उभरते सितारे। मुझे यो ये आवाज़ काफी मीठी लगी यदि आपके दिल को भी ये आवाज़ छू जाये तो ज़रूर शेयर करें।


Tuesday, 21 November 2017

दैत्य!!!







आज मैं एक यौवन के बाग में पहुँचा। तरह- तरह के मनभावन खिले थे चारो ओर और वह बाग़ किसी स्वर्ग से कम नहीं था। नन्ही सी कलियाँ अपने यौवन सौन्दर्य को और अधिक निखारने को लालायित थीं। मैं बाग़ में आगे की ओर चल दिया और उस बाग़ की सुंदरता को निहारने लगा। तभी अचानक मेरी नज़र उस बाग़ के माली पर पड़ी जिसके चेहरे पर चिंताएं साफ़ देखी जा सकती थी।
 वह काफी लाचार दिखाई दे रहा था। मैं अचंभित था कि यने सुन्दर बाग़ में कोई इतना उदास कैसे हो सकता है? और वो भी वह व्यक्ति जिसने उस बाग़ को विकसित करने में अपना पूर्ण जीवन लगा दिया। मैंने उस व्यक्ति से उसकी परेशानी का कारण पूछा। उससे पता चला कि दैत्यों की एक टोली उसकर बाग़ के सौंदर्य को नष्ट कर रही थी। हर रोज़ कोई न कोई कली उनकी हैवानियत की भेंट चढ़ जाती। उस बाग़ का सौंदर्य उन दैत्यों के पैरों तले कुचला जा रहा था। यह सब सुनना वाकई बहुत दुखदायी और हृदयविदारक था। तभी किसी के आने की आहट सुनाई दी। अरे! यह तो वही राक्षसों की टोली थी जो इंसानो की शक्ल वाले थे। अब मैं निराश था और शर्मिंदा भी....

#mhicha

Saturday, 18 November 2017

क्यों? क्या घिन आती है हमसे?

क्यों? क्या घिन आती है हमसे?
हमारा तो काम यही है, 
थककर चूर होते हैं जब
आराम यहीं है।


बंद चार दिवारों में रहते हो
हमे दुत्कारते हो
खिड़की से कूड़ा फेंक सड़क पर
रौब झाड़ते हो
जब देखते हो सड़क पर
पैरो की धूल समझते हो
हमें मवेशी से भी घटकर
क्यों मानते हो???

कल ही तो एक कुकुर
और लेकर आ गए
सेल्फी अपडेट करके
सोशल मीडिया पर छा गए।
हमसे पूछने हाल कभी
क्यों न आते हो तुम
क्यों कभी हमें अपना
घर ले जाते हो तुम????

सब गंदगी तुम्हारी 
हम साफ़ करते हैं।
तुम ही बोलो 
क्या कोई पाप करते हैं।
मिलते हो जिससे भी
कहते हो कि 
हमारा तो यही धंधा है
दिल पर हाथ रख कह दो
हम गंदे हैं या कौन गन्दा है???

सफ़ेद कपड़ो की चमक तुम्हारी
सब कुछ तो कह गयी
दिल की बातें हमारे दिल में ही रह गयी
फिर क्यों न सोऊँ यहीं
कूड़े के ढेर में
माने मेरे सपनो की दुनिया
है फिर से ढ़ह गयी।
#mhicha

अगर इन पंक्तियों में आपको इन अभावग्रस्त बच्चो के मन की बात सुनाई दे तो कृपा करके अपने सभी मित्रों के साथ साझा करें एवं उनसे आग्रह करें कि कभी इन बच्चों को देखकर मुँह न फेरें और न ही इन्हें लताड़ लगाएं अपितु इनके पास जाकर हरसंभव मदद करने की कोशिश करें और खुद भी ऐसा करें।

विनम्र निवेदन!
हेम चंद्र तिवारी

Monday, 13 November 2017

बाल दिवस

आज का दिन बहुत खास है। 14 नवंबर, बाल दिवस का दिन। सभी लोग बधाइयाँ देंगे एक-दूसरे को। विद्यालयों में तरह-तरह के कार्यक्रम होंगे। नन्हे-मुन्हे बच्चे जो पहले से ही संपन्न परिवारों से हैं उन्हें उपहार दिए जाएंगे और शायद आज का दिन उन गरीब बेसहारा बच्चो की भी ईद साबित हो जाये जिन्हें दो वक़्त का भोजन नसीब नहीं होता। कितना अच्छा लगता है मन को यह सोचकर कि आज बाल दिवस के दिन किसी बेसहारा बच्चे की मदद कर दी।

फिर आएगा कल का दिन 15 नवंबर। और फिर क्या? सब पहले जैसा। सड़क पर मांगने वाले बच्चों का हुजूम और उन्हें भीख देने वाले और फटकारने वाले आप और मुझ जैसे ही लोग जिन्होंने एक दिन पहले ही बाल दिवस मनाया था, सब कुछ भूलकर, अपने कार्यो में फिर से व्यस्त।

आओ
अबकी बार
हर दिन एक बाल दिवस हो
हर दिन उस गरीब बालक के जीवन में दिवाकर प्रभात फेरी लगाये
खुशहाली उसके चेहरे पर और मुस्कान होठो पर हो
दरिद्रता उससे कोसो दूर हो
शिक्षा, आहार, स्वास्थ्य एवं आशियाना उसके साथी बने
हँसी की किलकारियों से हर वो सड़क गूंजे जहाँ कभी दरिद्रता की करुण आवाज़ दुहाई देती थी

समस्त नागरिको से अपील है कि हमेशा जब किसी ऐसे बेसहारा और दरिद्र बच्चे को सड़को पर देखें तो उसे अनदेखा न करें या उसकी थोड़ी सहायता करके अपने दायित्वों की खानापूर्ति न करें। वरन स्थानीय लोगो की मदद से एवम स्वयं के प्रयासों से उसे किसी बाल संस्था या प्रशासन के सुपुर्द कर मानवता का परिचय दें।

हेम चंद्र तिवारी की ओर से आप सभी मित्रों को बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

Thursday, 13 July 2017

हुँकार




हौंसलों  को देख हमारे
खौफ़ तो खाते ही हो तुम
जिस दिन ठान लेंगे हम
कसम से,
वो दिन तुम्हारा आख़िरी होगा।

बहुत पैगाम देते हो मिडिया पर
आतंक की नुमाइंदगी का
जिस दिन गरजेंगे हम तुम पर
कसम से,
वो पैगाम तुम्हारा आख़िरी होगा।

ख़ुदा को बदनाम कर रहे
तुम वहशी भेड़िये कायर हो
जिस दिन आमना-सामना होगा
कसम से,
वो मुक़ाम तुम्हारा आख़िरी होगा।

दुआ करो खुद़ा से वो दिन जल्द आये
तुम जन्नत की सैर करो और हूर तुम्हारे पैर दबाये।

बहुत खून की नदियाँ बह चुकी
जेहाद के नाम पर धरती में
जब कफन बाँधकर निकलेंगे हम
कसम से, 
वो जेहाद तुम्हारा आख़िरी होगा।
#mhicha


Thursday, 9 February 2017

मेरा प्यार.... तेरे नाम



जाना- पहचाना  ये जहाँ
जाना- पहचाना  पल
ऐसा लगता है साथ तेरे
जिया हूँ मैं हर पल

जाना -पहचाना राग है
जानी -पहचानी धुन
मीठे- मीठे से ख्वाब है
और उन ख्वाबो में तुम

तेरी यादें भी कुछ कहती हैं
मेरी आँखों में तू दिखती है
थामा है हाथ तेरा हर पल
तू साथ मेरे ही रहती है

खोया -खोया सा ये समा
खोए- खोए से हम
तू साथ रहे तो खुशिया है
तेरे साथ बिना है गम

महकी- महकी सी ये हवा
बहका -बहका है मन
तुझसे मिलने को रात-दिन
करता रहता हूँ जतन

मेरी आँखें भी कुछ कहती हैं
मेरी आँखों में तू बसती है
सावन गिरने को आया है
छाई हर पल मस्ती है

फिरता हू ऐसे हर जगह
हर राह पे जैसे तुम
तेरे ख्वाब संजोए नैनो में
अब दिल की तू भी सुन

जाना -पहचाना राग है
जानी -पहचानी धुन
मीठे -मीठे से ख्वाब है
और उन ख्वाबो में तुम

#mhicha

Thursday, 5 January 2017

उम्मीद

तमन्नाओं के जलते दिये यूँ बुझते नहीं
लौ तिलमिलाती बहुत है
उम्मीद बाकी रहती है आख़री क्षण तक
जब तक हौसले टूटते नहीं
नाकामी के तूफानों को भी चीरकर
फिर से जल उठती है एक लौ
उम्मीद की
जो कभी बुझती नहीं।

न जाने कितने ही झौंके संभाल
अपनी चमक को बरक़रार रखती
अंधेरों को हरदम रोशन कर
दिनकर की भाँति,
वो स्वच्छन्द हवाओं से बातें करती
एक तेज़ के साथ कहती उनसे
" लाख चाहे तू जतन कर मेरे वज़ूद को मिटाने की,
फिर अपनी आह समेटे जल उठूँगी और जगमगाऊँगी।"

फिर जल उठती है एक लौ
उम्मीद की
जो कभी बुझती नहीं।

(C)
हेम चंद्र तिवारी

Saturday, 8 October 2016

सुख-दुःख

हँसते मुस्कराते ये पल
जीवन में रहते हैं ऐसे
साथी पलभर के जीवन में
बनकर के रहते हैं जैसे
खुशियों में जब हम खो जाते हैं
दुख रहते हैं दूर सभी
दस्तक तब दुख देते हैं
जीवन के पहलू हों जैसे

सुख में जैसे मौज मनाकर
हम जीवन जी लेते हैं
सारा मधुमृत छान-छानकर
झटपट ही पी लेते हैं
दुख के क्षीर भी छोङें क्यों
सरस तरिनी जब मी गये
ये भी तो हैं साथी जीवन के
शीश औ पग साथ हों जैसे

मौजी तू जीवन का, जल्द ही,
अंधकार से घबराता है
अपने इस दुखियारे जीवन से
आखिर तू क्यों कतराता है?
याद तुझे ये रहे हमेशा
सृष्टि का भी यही नियम है
तेरा जीवन फिर उदित ही होगा
सूर्य उदित होता है जैसे।


By
Hem Chandra Tiwari
mhicha

कई भाई लोग साथ आ रहे हैं, अच्छा लग रहा है, एक नया भारत दिख रहा है। आजाद हिंद के सपनो का अब फिर परचम लहरा है। उन्नति के शिखरों में अब राज्य ह...